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दो साल के सर्वेक्षण में पश्चिमी घाट में ओडोनाटा की 143 प्रजातियां दर्ज, लेकिन ज्ञात विविधता में 35% की कमी सामने आई
पुणे, अप्रैल 2026: पश्चिमी घाट में किए गए एक महत्वपूर्ण दो साल के सर्वेक्षण में क्षेत्र की जैव विविधता को लेकर एक चिंताजनक तथ्य सामने आया है। शोधकर्ता इस क्षेत्र में ऐतिहासिक रूप से दर्ज ड्रैगनफ्लाई और डैमसेलफ्लाई की प्रजातियों में से केवल करीब 65% प्रजातियों को ही रिकॉर्ड कर सके, जो इन पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण कीड़ों की करीब 35% प्रजातियों की संभावित कमी की ओर इशारा करता है।
फरवरी 2021 से मार्च 2023 के बीच किए गए इस अध्ययन में पांच राज्यों के 144 स्थानों पर ओडोनाटा की आबादी का सर्वे किया गया। ओडोनाटा कीड़ों का एक वर्ग है जिसमें ड्रैगनफ्लाई और डैमसेलफ्लाई शामिल हैं। इस सर्वेक्षण की व्यापकता और विस्तार इसे पश्चिमी घाट में मीठे पानी की जैव विविधता का आकलन करने के लिए हाल के सबसे बड़े प्रयासों में से एक बनाती है। पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट पर स्थित 1,600 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रृंखला है और इसे वैश्विक स्तर पर जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
शोध दल में डॉ. पंकज कोपार्डे (सहायक प्रोफेसर, एमआईटी-डब्ल्यूपीयू पुणे), अराजुश पायरा (पीएचडी शोधार्थी, एमआईटी-डब्ल्यूपीयू पुणे), अमेय देशपांडे (एमएससी छात्र, एमआईटी-डब्ल्यूपीयू पुणे) और रेजी चंद्रन (सोसाइटी फॉर ओडोनेट स्टडीज, केरल) शामिल थे। इन्होंने नदियों, नालों, झरनों, तालाबों, झीलों और बांधों सहित मीठे पानी के विभिन्न आवासों में कठोर क्षेत्र कार्य किया। इनमें से कई स्थान दूरदराज और पहुंचने में कठिन थे, जहां भूभाग की चुनौतियों और आधिकारिक अनुमतियों की जरूरत ने काम को और मुश्किल बनाया।
अध्ययन के दौरान दल ने 143 अलग-अलग ओडोनेट प्रजातियां दर्ज कीं, जिनमें पश्चिमी घाट के लिए विशिष्ट 40 स्थानिक प्रजातियां शामिल हैं। हालांकि, यह कुल संख्या इस क्षेत्र में ऐतिहासिक रूप से ज्ञात प्रजातियों का केवल करीब 65% ही है, जो एक चिंताजनक कमी है और प्रजातियों के घटने तथा आवास क्षरण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
ओडोनेट पर्यावरणीय बदलावों के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं, क्योंकि वे प्रजनन के लिए पूरी तरह मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर होते हैं। इसीलिए इन्हें “संकेतक प्रजाति” माना जाता है, यानी इनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति सीधे जलाशयों के पारिस्थितिक स्वास्थ्य को दर्शाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जो प्रजातियां नहीं मिलीं, वे गहरे पारिस्थितिक संकट के शुरुआती संकेत हो सकती हैं।
यह अध्ययन पश्चिमी घाट में कई बढ़ते खतरों की ओर इशारा करता है। इनमें रैखिक बुनियादी ढांचे का विकास, जलविद्युत परियोजनाएं, गंभीर प्रदूषण और बड़े पैमाने पर भूमि उपयोग में बदलाव शामिल हैं। इसके अलावा अनियंत्रित पर्यटन, बार-बार लगने वाली जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव इन पारिस्थितिकी तंत्रों को और अधिक विखंडित और क्षतिग्रस्त कर रहा है।
दर्ज की गई प्रजातियों की संरक्षण स्थिति भी चिंता बढ़ाती है। तीन प्रजातियां जैसे एलैटोन्यूरा सौटेरी, प्रोटोस्टिक्टा सैंगुइनोस्टिग्मा और साइक्लोगोम्फस वाईपसिलॉन फिलहाल “असुरक्षित” (वल्नरेबल) श्रेणी में हैं। वहीं अधिकांश देखी गई प्रजातियां आईयूसीएन की खतरे में पड़ी प्रजातियों की रेड लिस्ट में “डेटा डेफिशिएंट” और “नॉट इवैल्युएटेड” श्रेणी में आती हैं, जो वैज्ञानिक समझ में बड़ी खामियों को दर्शाता है।
अध्ययन राज्यों के बीच अंतर को भी उजागर करता है। महाराष्ट्र, जहां सबसे अधिक 105 स्थानों का सर्वेक्षण किया गया, वहां 12 स्थानिक प्रजातियों सहित 100 प्रजातियां दर्ज की गईं। केरल में कम सर्वेक्षण स्थलों (14) के बावजूद 83 दर्ज प्रजातियों में से 33 स्थानिक प्रजातियों के साथ स्थानिक प्रजातियों की भरमार देखने को मिली। कर्नाटक (17 स्थान) में 6 स्थानिक प्रजातियों सहित 64 प्रजातियां, गोवा (3 स्थान) में 4 स्थानिक प्रजातियों सहित 35 प्रजातियां और गुजरात (5 स्थान) में बिना किसी स्थानिक प्रजाति के 18 प्रजातियां दर्ज की गईं।
निष्कर्षों पर विचार करते हुए डॉ. पंकज कोपार्डे ने शोध प्रयासों को विस्तार देने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “यह अध्ययन घाट में ओडोनाटा के सबसे व्यापक सर्वेक्षणों में से एक का नतीजा है। हम दक्षिण से उत्तर की ओर प्रजातियों की संरचना में बदलाव देख रहे हैं, जिसका और अध्ययन किए जाने की जरूरत है। हमारे सर्वेक्षण घाट के ज्ञात ओडोनाटा जीव-जंतुओं का केवल 65% ही उजागर कर सके, जो प्रजातियों और आवासों के संभावित नुकसान का संकेत देता है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह शोध “मौजूदा साहित्य में मूल्य जोड़ता है, एक महत्वपूर्ण खाई को भरता है और संरक्षण के लिए ओडोनाटा समृद्ध क्षेत्रों को प्राथमिकता देने की नींव रखता है।”
144 स्थानों का यह सर्वेक्षण पश्चिमी घाट में भविष्य में पारिस्थितिक निगरानी के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है। साथ ही, यह एक स्पष्ट चेतावनी भी है: जब तक प्रदूषण, आवास क्षति और पारिस्थितिकी तंत्र के विखंडन को दूर करने के लिए तत्काल और निरंतर प्रयास नहीं किए जाते, इस क्षेत्र में न केवल व्यक्तिगत प्रजातियां, बल्कि वे नाजुक मीठे पानी के तंत्र भी खत्म होने का खतरा है जिन्हें ये प्रजातियां जीवित रखने में मदद करती हैं।


